पति का साथ छूटा, मगर हौसला नहीं टूटा; आत्मनिर्भरता की मिसाल बनी मैलबेड़ा की 5 विधवा महिलाएं

= पारंपरिक कुटीर उद्योग को आगे बढ़ाकर चला रही हैं अपना घर परिवार
= व्यापारी कर रहे हैं इन महिलाओं का शोषण


-अर्जुन झा-
बकावंड। विकासखंड बकावंड में विष्णु देव साय सरकार के सुशासन का असर अब दिखने लगा है। यहां की महिलाएं साय सरकार की योजनाओं के माध्यम से अब स्वावलंबी बन रही हैं। ये महिलाएं जहां आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो रही हैं, वहीं ग्रामीण परंपरा को जीवित रखने में भी बड़ा योगदान भी दे रही हैं। खास बात यह है कि इनमें से कई महिलाओं के जीवन साथी अब इस दुनिया में नहीं हैं।
किसी महिला का विधवा हो जाना उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी है।एक तो कमाने वाले मुखिया का साथ छूट जाता है, दूसरा बाल बच्चों की परवरिश की बड़ी जिम्मेदारी सिर पर आ जाती है। वैधव्य महिलाओं को तोड़ कर रख देने वाला घटनाक्रम है, मगर दाद देनी होगी बकावंड की इन साहसी माता बहनों को जिन्होंने पति का साथ छूट जाने के बाद भी हौसले का साथ नहीं छोड़ा। इसी हौसले के दम पर ये वीरांगनाएं आज आत्मनिर्भरता की मिसाल बनकर उभर चुकी हैं।बकावंड ब्लॉक के अंतर्गत ग्राम पंचायत मैलबेड़ा के जानीपारा में संचालित कुटीर उद्योग आज भी गांव की अर्थव्यवस्था और परंपरा दोनों को सहेज कर रखे हुए है। यहां की पांच विधवा महिलाएं अपनी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति के दम पर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश कर रही हैं। पति से विछोह के बाद भी इन महिलाओं ने किसी पर निर्भर रहने के बजाय अपनी हिम्मत और हुनर पर विश्वास करते हुए घर आधारित कुटीर उद्योग स्थापित किया है। वे पारंपरिक तरीके से बस्तर और ओड़िया में प्रसिद्ध गोपा टाकती टुकना बनाती हैं। घरेलू उपयोग के ये सामान बांस और सरई से बनाए जाते हैं। सप्ताह भर की मेहनत में ये महिलाएं लगभग 2 हजार रुपए तक की सामग्री तैयार कर लेती हैं। इस कुटीर उत्पाद की सबसे खास बात यह है कि यह पूरी तरह टिकाऊ, पर्यावरण अनुकूल और लंबे समय तक चलने वाला होता है। यही वजह है कि व्यापारी खुद इनके घर तक सामान खरीदने पहुंच जाते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि
जहां प्लास्टिक का टोकना 50 रुपये से अधिक में बेचा जाता है और थोड़े इस्तेमाल में ही टूट जाता है, वहीं इन महिलाओं द्वारा बनाए गए मजबूत और टिकाऊ टुकना को व्यापारी सिर्फ 10 से 20 रुपये तक में खरीद कर ले जाते हैं। यह इन मेहनतकश महिलाओं के कौशल और परिश्रम का सरासर अनुचित मूल्यांकन है। इन महिलाओं को दिन रात मेहनत करते देखने पर महसूस होता है कि इन्हें उचित मूल्य, बाजार, और सरकारी सहयोग की बहुत आवश्यकता है। इनके बनाए सामान की गुणवत्ता प्लास्टिक से कहीं बेहतर और टिकाऊ होती है, लेकिन उचित दाम न मिलने से इनकी मेहनत का मूल्य दब जाता है। इन महिलाओं का संघर्ष और आत्मनिर्भरता वास्तव में प्रेरणादायक है, लेकिन अब समय आ गया है कि इनके इस परंपरागत कुटीर उद्योग को सम्मान, समर्थन और उचित बाजार मिले, ताकि इनकी जिंदगी में स्थायी खुशहाली आ सके। उम्मीद है संवेदनशील विष्णु देव साय सरकार इन मेहनतकश माताओं को उनके उत्पादों की सही कीमत दिलाने और इस उद्योग को बढ़ावा देने के लिए जरूर कदम उठाएगी।

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