ग्रामसभाओं की संवैधानिक संप्रभुता की जीत: संजू मौर्य

= सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय स्वशासन और सांस्कृतिक अधिकारों को दी मजबूती

कांकेर। कांकेर जिले से प्रारंभ हुआ एक महत्वपूर्ण कानूनी विवाद अब देश की न्यायिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने ग्राम सभाओं की निर्णय लेने की स्वायत्तता को बरकरार रखते हुए ईसाई पादरियों की दायर याचिका में हस्तक्षेप से इंकार किया है। इसे स्थानीय स्वशासन और सांस्कृतिक संरक्षण के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आदिवासी समाज के प्रतिनिधि संजू मौर्य ने कहा है कि मामले की पृष्ठभूमि में कांकेर जिले की कुछ ग्राम पंचायतों द्वारा लगाए गए ऐसे बोर्ड शामिल थे, जिनमें ईसाई पादरियों के प्रवेश पर प्रतिबंध का उल्लेख किया गया था। ग्राम सभाओं का तर्क था कि उनकी पारंपरिक जनजातीय संस्कृति, सामाजिक संरचना और स्थानीय रीति-रिवाजों की रक्षा करना उनका दायित्व है। इसके विरोध में संबंधित पक्ष ने न्यायालय की शरण ली थी। सर्वोच्च न्यायालय ने संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के अंतर्गत ग्राम सभाएं अपने सामाजिक और सांस्कृतिक हितों की रक्षा हेतु निर्णय लेने में सक्षम हैं। न्यायालय ने विशेष रूप से अनुसूचित क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन की भावना को महत्व दिया।संजू मौर्य ने आगे कहा कि यह फैसला न केवल बस्तर अंचल बल्कि देशभर के अनुसूचित क्षेत्रों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होगा। इससे स्थानीय समुदायों की भागीदारी, सांस्कृतिक पहचान और परंपरागत अधिकारों को संवैधानिक संरक्षण की नई पुष्टि मिली है। संजू मौर्य ने कहा कि यह फैसला उन लोगों के लिए स्पष्ट संदेश है जो ग्राम सभाओं की संप्रभुता को चुनौती देने का प्रयास करते हैं। लोकतंत्र की असली ताकत गांव की ग्रामसभा में है, और यह निर्णय उसी शक्ति की विजय है। उन्होंने आगे कहा कि पांचवीं अनुसूचित क्षेत्र बस्तर जैसे सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में यह फैसला आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षा कवच का कार्य करेगा।

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